अस्सलामलैकुम,ज़ैदी साहब, अज़ा-ए-हुसैन,ये लब्ज़,सुनकर ही आंखों से अश्क़ बहने लगते है। नज़रों के सामने करबला का मंज़र आ जाता है।वो धूप,और प्यास की शिद्दत और वो बहत्तर शहीद!वो नन्हे-नन्हे बच्चो का प्यास से बिलख़ना और यज़ीद का ज़ुल्म ढाना। जब जब पानी देख़ेंगे, करबला याद आयेगी या हुसैन। ज़ैदी साहब हम भी शोहदा ए करबला के ज़व्वार है? नौहे-सलाम लिखते है/मुहर्रम अरबइं में पढते है।आपको हमारे गुजरात के मुहर्रम से वाकिफ कराएंगे?ईंशाअल्लाह। खुदा हाफिज़। मोहिब्बाने एहलेबैत को हमारा सलाम रज़िया मिर्ज़ा
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अस्सलामलैकुम,ज़ैदी साहब,
अज़ा-ए-हुसैन,ये लब्ज़,सुनकर ही आंखों से अश्क़ बहने लगते है। नज़रों के सामने करबला का मंज़र आ जाता है।वो धूप,और प्यास की शिद्दत और वो बहत्तर शहीद!वो नन्हे-नन्हे बच्चो का प्यास से बिलख़ना और यज़ीद का ज़ुल्म ढाना। जब जब पानी देख़ेंगे, करबला याद आयेगी या हुसैन।
ज़ैदी साहब हम भी शोहदा ए करबला के ज़व्वार है? नौहे-सलाम लिखते है/मुहर्रम अरबइं में पढते है।आपको हमारे गुजरात के मुहर्रम से वाकिफ कराएंगे?ईंशाअल्लाह।
खुदा हाफिज़।
मोहिब्बाने एहलेबैत को हमारा सलाम
रज़िया मिर्ज़ा
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